Paddy Disease Management: छत्तीसगढ़ में खरीफ सीजन के दौरान धान प्रमुख फसल है। मौजूदा मौसम की परिस्थितियां धान की फसल में कई तरह के रोग और कीटों के लिए अनुकूल हो सकती हैं। समय रहते इनकी पहचान और उचित प्रबंधन नहीं किया गया तो इसका सीधा असर फसल की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
इसी को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, कवर्धा ने किसानों को धान की फसल की नियमित निगरानी करने और रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही उचित कदम उठाने की सलाह दी है। कृषि विज्ञान केंद्र, कवर्धा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.पी. त्रिपाठी ने किसानों के लिए धान में होने वाले प्रमुख रोगों और कीटों के प्रबंधन को लेकर उपयोगी सुझाव जारी किए हैं।
धान में ब्लास्ट रोग के लक्षण दिखें तो रहें सतर्क
धान की फसल में ब्लास्ट रोग प्रमुख बीमारियों में शामिल है। इसकी पहचान पत्तियों पर आंख या नाव के आकार के धब्बों से की जा सकती है। अगर खेत में इस तरह के लक्षण दिखाई दें तो किसानों को पोटाश और अनुशंसित फफूंदनाशक का उपयोग कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार करने की सलाह दी गई है।
वहीं जीवाणु जनित झुलसा रोग में पत्तियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं। पत्तियों के किनारों पर भी सूखापन दिखाई दे सकता है। ऐसे लक्षण सामने आने पर स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और मैंकोजेब का अनुशंसित मात्रा में छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
इसी तरह धान की पत्तियों पर भूरे धब्बे दिखाई देने पर मैंकोजेब अथवा ट्राइसाइक्लाजोल का अनुशंसित मात्रा में प्रयोग किया जा सकता है।
शीथ ब्लाइट से भी फसल को बचाना जरूरी
धान में शीथ ब्लाइट भी एक प्रमुख रोग है। खासकर अधिक नमी और जलभराव की स्थिति में इसके तेजी से फैलने की संभावना रहती है। शुरुआत में धान के तने और पत्ती की शीथ पर मटमैले रंग के चकत्तेनुमा धब्बे दिखाई देते हैं।
अगर समय पर नियंत्रण नहीं किया गया तो ये धब्बे धीरे-धीरे बड़े होते जाते हैं और इसका असर पौधे की वृद्धि के साथ-साथ उत्पादन पर भी पड़ सकता है। इसलिए किसानों को खेत में जलभराव की स्थिति से बचने, फसल की नियमित निगरानी करने और शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उचित फफूंदनाशक का प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
धान के इन कीटों पर भी रखें नजर
धान की फसल में कई तरह के कीट उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें तना छेदक, भूरा माहू, पत्ती लपेटक, बंकी, गंगई, कटुवा, गंधी कीट, पैनिकल माइट और लाल कीड़ा प्रमुख हैं।
इन कीटों की शुरुआती अवस्था में पहचान करना बेहद जरूरी है, ताकि समय रहते इनका समन्वित प्रबंधन किया जा सके। तना छेदक के नियंत्रण के लिए फिप्रोनिल 0.3 जी अथवा क्लोरेंट्रानिलीप्रोल 4 जी को अनुशंसित मात्रा में खाद या रेत में मिलाकर प्रयोग करने की सलाह दी गई है।
वहीं भूरा माहू दिखाई देने पर ब्यूप्रोफेजिन 25 एससी, डाइनोटेफ्यूरान 20 एसजी अथवा डाइनोटेफ्यूरान-पाइमेट्रोजिन आधारित अनुशंसित कीटनाशकों का कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार छिड़काव किया जा सकता है।
पैनिकल माइट की रोकथाम के लिए स्पाइरोमेसिफेन 22.9 एससी और लाल कीड़े के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूजी के अनुशंसित उपयोग की सलाह दी गई है।
किसान नियमित रूप से खेत की निगरानी करें
कृषि विज्ञान केंद्र ने किसानों से अपील की है कि वे धान की फसल का नियमित निरीक्षण करते रहें। किसी भी तरह के रोग या कीट के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर तत्काल कृषि विशेषज्ञों या कृषि विभाग से संपर्क करें।
किसानों को अनावश्यक या जरूरत से ज्यादा कीटनाशक और फफूंदनाशक इस्तेमाल करने से बचने की सलाह दी गई है। केवल अनुशंसित दवा और उसकी निर्धारित मात्रा का ही उपयोग करना चाहिए।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक रोग और कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए खेत की स्थिति, मौसम, फसल की अवस्था और प्रकोप की तीव्रता को ध्यान में रखते हुए समन्वित कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाना ज्यादा प्रभावी रहता है। समय पर रोग और कीटों की पहचान कर उचित प्रबंधन करने से फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है और किसानों की उत्पादन क्षमता तथा आय को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
